
भारतीय रेलवे ने पुलों के अप्रोच और पॉइंट्स तथा क्रॉसिंग्स पर उपयोग होने वाले रेल स्लीपर्स के निर्माण के लिए कम्पोजिट मटीरियल का उपयोग करने का निर्णय लिया है। यह निर्णय केंद्रीय रेल मंत्री द्वारा गुरुवार को नई दिल्ली स्थित रेल भवन में आयोजित एक उच्च-स्तरीय बैठक में लिया गया।

कम्पोजिट मटीरियल क्यों?
कम्पोजिट मटीरियल से बने स्लीपर ‘विद्यमान भारी लोहे और कंक्रीट के स्लीपरों की तुलना में हल्के होते हैं। इसके अलावा, ये अधिक भार उठाने में भी सक्षम होते हैं।
इनमें बेहतर कुशनिंग होती है, और इन्हें बिछाना व मरम्मत करना भी आसान होता है। साथ ही, इन स्लीपरों को भूमि की परिस्थिति (जहाँ इनका उपयोग किया जाना है) के अनुसार डिज़ाइन और इंस्टॉल किया जा सकता है।
कंक्रीट और लोहे की तुलना में, मिश्रित मटीरियल से बने ये कम्पोजिट स्लीपर प्रति वर्ग सेंटीमीटर 700 किलोग्राम तक का भार सहन कर सकते हैं।
ये स्लीपर अधिक समय तक चलेंगे, और इनके उपयोग से भारतीय रेल के लिए स्लीपरों के रखरखाव का खर्च भी कम हो जाएगा।
स्लीपरों के लिए कम्पोजिट मटीरियल के उपयोग से, खासकर ट्रेन के, पुलों एवं पॉइंट्स और क्रॉसिंग को पार करते समय यात्रियों का अनुभव बेहतर होगा।

ट्रैक की निगरानी में AI का उपयोग
भारतीय रेल ने तय किया है कि अब रेलवे ट्रैक की निगरानी Artificial Intelligence (AI) की मदद से की जाएगी। इसके लिए, Ground Penetration Radar नाम का एक खास AI-इनेबल्ड डिवाइस इंस्पेक्शन गाड़ियों में लगाया जाएगा। यह डिवाइस ट्रैक के बेस की हालत का निरीक्षण करेगा।

‘मैग्नेटिक पार्टिकल टेस्टिंग’ से रेल जोड़ों की वेल्डिंग की जांच
रेलवे पटरियों में वेल्डिंग की गुणवत्ता को और बेहतर बनाने के लिए, भारतीय रेल ने एक नई तकनीक—’मैग्नेटिक पार्टिकल टेस्टिंग’ का उपयोग करने का निर्णय लिया है। यह टेस्टिंग वेल्ड किए गए जोड़ों में मौजूद बहुत छोटी-छोटी कमियों की पहचान करने में प्रभावी है। इन निर्णयों को लागू करने से रेलवे पटरियों पर यात्रियों की सुविधा और संरक्षा—दोनों में सुधार होगा।
